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Wednesday, July 30, 2025

 


महकुचा – कायस्थों के इतिहास की धरोहर

जौनपुर से अमित श्रीवास्तव की रिपोर्ट:
कायस्थों की रियासत, वैभव और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक महकुचा आज भी अपने अतीत की गौरवगाथा कहता है। गुप्त साम्राज्य के दौर से लेकर मुग़ल और अंग्रेजी शासन तक यह गाँव कायस्थों की कर्मभूमि और वैभवशाली परंपराओं का केंद्र रहा है।

गुप्त युग से आबादी की नींव:
इतिहासकारों के अनुसार लगभग 300 ईस्वी के आसपास कड़े मानिकपुर (वर्तमान कौशांबी और प्रतापगढ़) से चार सगे कायस्थ भाई—कृपाल दास, नरहर दास, मानिक दास और बिहारी दास—गुप्त साम्राज्य में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन थे। प्रशासन द्वारा उन्हें संभलपुर क्षेत्र में बसाया गया, जो बाद में “पुरा कृपाल दास” के नाम से प्रसिद्ध हुआ और समय के साथ महकुचा बन गया।



मुग़ल युग में वैभव का उत्कर्ष:
मुग़ल काल में कायस्थों ने यहाँ भव्य हवेलियाँ, मंदिर और तालाबों का निर्माण कराया। मुंशी शंकर लाल श्रीवास्तव द्वारा बनवाई गई विशाल हवेली और शिव मंदिर आज भी स्थापत्य कला के अनुपम उदाहरण हैं। यहाँ के जनाना घाट, संगमरमर की मूर्तियाँ और मथुरा-मुग़ल शैली के मिश्रित मंदिर अतीत की समृद्धि को उजागर करते हैं।

अंग्रेज़ी शासन और जमींदारी व्यवस्था:
ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में मुंशी राजाराम श्रीवास्तव और मुंशी सीताराम श्रीवास्तव जैसे कायस्थ जमींदारों ने आसपास के गाँव खरीदे और प्रशासनिक केंद्र स्थापित किए। यही नहीं, डाकखाना और विद्यालय जैसी सार्वजनिक सुविधाएँ भी कायस्थों के दान से ही स्थापित हुईं।



सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान:
महकुचा केवल प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अग्रणी रहा है। यही वह भूमि है जहाँ से हिन्दी के प्रख्यात कवि विश्वनाथ प्रसाद श्रीवास्तव और कवि एकलव्य जी जैसे विद्वान निकले। वर्ष 1999 में यहाँ हुई कवि गोष्ठी में देशभर के हिन्दी विद्वानों ने भाग लिया था।

वर्तमान स्थिति और गौरव:
आज भी महकुचा के कायस्थ परिवारों द्वारा बनवाए गए मंदिर, हवेलियों के खंडहर और तालाब इस गाँव की ऐतिहासिक धरोहर को जीवंत रखते हैं। हालांकि अब अधिकांश कायस्थ परिवार शहरों में बस गए हैं, लेकिन उनकी दी हुई ज़मीनों पर बसे बाज़ार (भगवान गंज और कमला बाजार) और शिक्षा संस्थान इस गाँव की सामाजिक चेतना के प्रतीक हैं।



निष्कर्ष:
महकुचा न केवल कायस्थों की रियासत का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय इतिहास की उस परंपरा का जीवंत प्रमाण है, जिसमें समाज, संस्कृति और प्रशासन का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

अमित श्रीवास्तव (प्रधान संपादक)


Wednesday, July 9, 2025

“माँ की ममता” का अमिट चित्रण- एक रिपोर्ट

 अशोक सरोज की पेंटिंग ने छू लिया दिल – “माँ की ममता” का अमिट चित्रण



जौनपुर/मुंबई
मायानगरी मुंबई में पेंटिंग के माध्यम से संवेदनाओं की गहराइयों को उकेरने वाले जनपद जौनपुर के युवा कलाकार अशोक सरोज ने एक ऐसी कृति रची है, जिसने देखने वालों के हृदय को झकझोर कर रख दिया। यह पेंटिंग सिर्फ रंगों का मेल नहीं, बल्कि माँ की ममता, त्याग और जीवटता का एक ऐसा मार्मिक दस्तावेज है, जो आंखों को नम कर देता है।

इस चित्र में एक पक्षी दंपत्ति को दिखाया गया है, जो दिन भर भोजन की तलाश में भटकते हैं, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिलता। शाम को जब वे अपने घोंसले पर लौटते हैं, तो उनका शिशु पक्षी भूख से बिलख रहा होता है। पिता पक्षी अपने चोंच से माता पक्षी के सिर पर चोट करता है और माँ अपने लहू की बूंदों से अपने बच्चे की भूख शांत करती है।

यह दृश्य काल्पनिक नहीं, बल्कि उस अपरिमित ममता की प्रतीक है, जो एक माँ किसी भी प्राणी की हो सकती है – मानव हो या पक्षी।


अशोक सरोज की यह पेंटिंग एक सवाल छोड़ जाती है:
क्या आज की दुनिया में हम इतनी संवेदनशीलता बचाए रख पा रहे हैं? क्या माँ के त्याग को हम सच में समझते हैं?

इस पेंटिंग को देखकर केवल कला की तारीफ नहीं होती, बल्कि माँ, ममता और बलिदान की परिभाषा फिर से जीवित हो जाती है।


“यह केवल चित्र नहीं, एक वेदना है, एक कथा है – उस ममता की, जो बिना किसी भाषा के भी सबसे गूढ़ संदेश दे जाती है।”

अशोक सरोज, चित्रकार (कैमरामैन  बालीवुड)


जनपद जौनपुर के इस लाल ने न केवल अपनी प्रतिभा से मायानगरी में पहचान बनाई है, बल्कि अपनी मिट्टी की संवेदनाओं को कैनवस पर उकेरकर पूरे देश को भावुक कर दिया है।



एक भावनात्मक संदेश -:


"यह पेंटिंग मैंने नहीं देखी, मैंने महसूस की है…"

अमित श्रीवास्तव, संपादक – दैनिक नव परिधि

"जब मैंने अशोक सरोज जी की यह अद्भुत पेंटिंग देखी, तो मेरी आंखें नम हो गईं। यह कोई साधारण चित्र नहीं, बल्कि माँ की ममता का रक्त से लिखा गया दस्तावेज है। उस पक्षिणी की पीड़ा, उसके त्याग और उसके प्रेम ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।

इस पेंटिंग ने यह सिखा दिया कि भूख, दर्द, बलिदान – यह सिर्फ इंसानों की दुनिया तक सीमित नहीं है। ममता हर प्राणी में होती है और शायद पक्षियों में तो और भी ज्यादा निर्मल।

मैं अशोक सरोज जी को दिल से नमन करता हूँ, जिन्होंने हमें यह अहसास दिलाया कि कला सिर्फ रंगों का खेल नहीं, आत्मा की अभिव्यक्ति होती है।"




Saturday, July 5, 2025

अशोक सरोज- एक व्यक्तित्व, एक पहचान:

 



रिपोर्ट:

'सफलता की कुंजी क्या है' इस पर मतभेद हो सकता है, मगर सफलता के अनेक कारणों में लगनशीलता, अनवरत उद्यम और लक्ष्य पर एकाग्रता पर सभी उद्यमी एक मत है। कुछ इन्ही गुणों के आधार पर अपने गाँव, जनपद और प्रदेश का नाम रोशन करने वाले, जनपद जौनपुर के एक छोटे से गाँव से निकल कर मायानगरी मुम्बई में अपना रसूख स्थापित करने वाले अशोक सरोज आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं।

2 फरवरी 1973 को जनपद जौनपुर के विकासखण्ड महराजगंज अंतर्गत ग्राम चारों में जन्में अशोक लगनशील और मृदुभाषी व्यक्तित्व के धनी हैं।

 बचपन से कला प्रेमी होने के कारण चित्रकला से लगाव रहा है। शिक्षा- बी.एफ.ए. (फाइन आर्ट्स) काशी हिन्दू विश्वद्यिालय वारराणसी से हुई है।

 अशोक का कैरियर का सफर बॉलीवुड में सन् 1985 से एक असिस्टेंट कैमरा मैन के रूप में शुरू होता है। जो बाद में चीफ असिसटेन्ट तौर पर फिर आपरेटिव कैमरामैन बन कर बहुत सारे टी. बी. सीरियलस, हिन्दी फिल्में, भोजपुरी, मराठी, गुजराती, पंजाबी एंव तमिल फिल्मों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं।

अशोक सरोज एक प्रतिभावान सिनेमाटोग्राफर है।  एक अच्छे कैमरामैन के साथ-साथ एक बेहद अच्छे  लेखक, कवि, और एक कुशल चित्रकार भी है। इनकी हर पेटिंग एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है। तथा एक संदेश देती है। ऐसे प्रतिभावान व्यक्तित्व आगामी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।