संपादकीय:
बदलती दुनिया में भारत की बढ़ती जिम्मेदारी

अमित श्रीवास्तव (प्रधान संपादक)
आज का विश्व केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि विश्वास, साझेदारी और स्थिरता का भी है। भारत की विदेश नीति, घरेलू प्रशासन और विकास की दिशा इस बात का संकेत दे रही है कि देश अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की ओर अग्रसर है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा इसी बदलते भारत का प्रतीक है। रक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के प्रयास यह दर्शाते हैं कि भारत अपनी "एक्ट ईस्ट" नीति को नए आयाम दे रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ता सहयोग केवल दोनों देशों के हित में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शांति और संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर, देश के कई हिस्सों में भारी वर्षा और उससे उत्पन्न चुनौतियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि विकास के साथ-साथ आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन और पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का संकट नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। प्रशासन की तत्परता आवश्यक है, किंतु दीर्घकालिक समाधान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
भारत आज विश्व मंच पर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है, लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी आंतरिक व्यवस्था, सुशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और नागरिकों के विश्वास से निर्धारित होती है। यदि विदेश नीति की सफलता के साथ घरेलू व्यवस्थाएँ भी समान गति से मजबूत हों, तो भारत वास्तव में विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, विपक्ष, उद्योग, मीडिया और समाज—सभी राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखते हुए रचनात्मक भूमिका निभाएँ। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व है।
दैनिक नव परिधि मीडिया सर्विसेज एण्ड पब्लिकेशन्स (पंजीकृत) का मानना है कि भारत के सामने अवसर भी बड़े हैं और चुनौतियाँ भी। विवेकपूर्ण नीतियाँ, राष्ट्रीय एकता और जनभागीदारी ही देश को सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर भविष्य की ओर ले जाएँगी।
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