खबरें

Friday, October 31, 2025

जंगलराज की वापसी या राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई?

 

AI निर्मित सांकेतिक तस्वीर 



📰 दैनिक नव परिधि – संपादकीय रिपोर्ट

शीर्षक:

जंगलराज की वापसी या राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई?"
— बिहार के ताज़ा अपराधों ने फिर उठाए सुशासन पर सवाल


उपशीर्षक:

हत्या पर हत्या, जातीय तनाव और चुनावी सियासत — क्या बिहार फिर पुराने भय में लौट रहा है?


भूमिका:

बिहार की ज़मीन फिर से खून से लाल हो रही है।
लगातार हो रही हत्याएँ न सिर्फ कानून-व्यवस्था की पोल खोल रही हैं, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर रही हैं कि 35 वर्षों की सत्ता के बाद भी बिहार “भयमुक्त” क्यों नहीं बन सका?
हर हत्या के बाद एक ही शब्द गूंजता है — “जंगलराज”।


राजनीति बनाम अपराध — दो चेहरे, एक सवाल:

बिहार में आज जो कुछ हो रहा है, वह चुनावी नतीजों से कहीं गहरा है।
यह राज्य की उस मानसिकता का प्रतीक है जहाँ हर घटना को राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है।
29 अक्टूबर को सीवान में दरोगा अनिरुद्ध कुमार की हत्या,
30 अक्टूबर को मोकामा में दुलारचंद यादव का एनकाउंटर-शैली मर्डर,
और 31 अक्टूबर को आरा में प्रमोद महतो और उनके बेटे प्रियांशु की गोली मारकर हत्या —
इन तीन दिनों में चार जानें गईं, पर राजनीति ने इसे भी जाति और गठबंधन के तराजू पर तौल दिया।


35 वर्षों का शासन, पर सुरक्षा अधूरी:

लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार तक, बिहार की सत्ता पर दो ही चेहरों का आधिपत्य रहा है।
नीतीश “सुशासन बाबू” के नाम से जाने जाते हैं, पर विपक्ष का तर्क है कि अब “सुशासन” की जगह “जंगलराज 2.0” आ गया है।
लालू यादव के शासन को भी यही नाम मिला था।
अंतर सिर्फ इतना है कि पहले अपराधी सत्ता से बाहर थे,
अब अपराध सत्ता के भीतर तक पहुँच गए हैं।


आंकड़ों की ज़बानी:

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार —

वर्ष मुख्यमंत्री कुल अपराध हत्याएँ अपहरण बलात्कार
1992 लालू यादव 1.31 लाख 5743 2700+ 1120
2004 राबड़ी देवी 1.15 लाख 3800 2500+ 1000+
2022 नीतीश कुमार 3.5 लाख 3000 12000 900

साफ़ है कि अपराधों की संख्या बढ़ी है, लेकिन हत्याओं में कमी आई है।
फिर भी सवाल यह नहीं कि अपराध कितने हुए, बल्कि यह है कि अपराध का डर क्यों बरकरार है?


मोकामा — जंगलराज का नया प्रतीक:

मोकामा में दुलारचंद यादव की हत्या के बाद वहाँ का माहौल भय और राजनीति के बीच झूल रहा है।
वीडियो वायरल, FIR दर्ज, और आरोपों की बाढ़ —
पर जनता के मन में सवाल वही है कि क्या बिहार फिर उस दौर में लौट रहा है जहाँ अपराध ही पहचान था?


जंगलराज की असली परिभाषा:

जंगलराज सिर्फ अपराधों का आंकड़ा नहीं होता।
यह वह स्थिति है जब जनता न्यायपालिका, प्रशासन और शासन — तीनों पर भरोसा खो देती है।
जब हर घटना के बाद लोग यह कहें कि “ये तो बिहार है”,
तो समझिए, शासन की आत्मा कमजोर पड़ चुकी है।


संपादकीय निष्कर्ष:

बिहार के लिए “जंगलराज” अब एक राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि एक सामाजिक मानसिकता बन चुका है।
कभी यह भय से उपजा, अब यह असंवेदनशीलता से पोषित हो रहा है।
सरकारें बदलती रहीं, पर व्यवस्था की कमजोरी जस की तस है।
अगर नेतृत्व सचमुच सुशासन चाहता है, तो उसे अपराधियों से पहले राजनीतिक अपराधीकरण का अंत करना होगा।


✍️ संपादक की टिप्पणी:

“जंगलराज का अर्थ सिर्फ अपराध नहीं,
बल्कि उस मौन से है जो न्याय की जगह डर को स्वीकार कर लेता है।”
अमित श्रीवास्तव, संपादक (दैनिक नव परिधि)


दैनिक नव परिधि मीडिया सर्विसेज एंड पब्लिकेशन (पंजीकृत)

अमित श्रीवास्तव (प्रधान संपादक)


Thursday, October 16, 2025

शीर्षक: बंधन (रचनाकार अशोक सरोज) पेस्टल एण्ड पेपर
साइज: 21×29 सेंटीमीटर



📰 शीर्षक:

गाँव की गलियों से बॉलीवुड के पर्दे तक — अशोक सरोज की प्रेरणादायक यात्रा

🧭 उपशीर्षक:

जौनपुर के छोटे से गाँव से निकलकर बने बॉलीवुड के सीनियर कैमरामैन और अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडलिस्ट चित्रकार, जिनकी कला समाज के गहरे संदेश देती है।


रिपोर्ट: अमित श्रीवास्तव

(दैनिक नव परिधि मीडिया सर्विसेज एंड पब्लिकेशन)

जौनपुर जनपद के विकासखण्ड महराजगंज क्षेत्र के ग्राम चारो से निकलकर मुंबई की चकाचौंध भरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अशोक सरोज आज बॉलीवुड के सीनियर कैमरामैन और अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्वर्ण पदक प्राप्त चित्रकार हैं। साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उन्होंने अपने परिश्रम और रचनात्मक दृष्टि से कला जगत में वह मुकाम हासिल किया है, जो बहुतों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

अशोक सरोज का कहना है कि “कला केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि समाज के भीतर छिपी संवेदनाओं को जीवंत करने का माध्यम है।” उनकी कई पेंटिंग्स सामाजिक सरोकारों को छूती हैं, जिनमें एक अनोखी गहराई दिखाई देती है।


🎨 पेंटिंग शीर्षक:

“बंधन” (The Bond)

पेंटिंग का संदेश:

अशोक सरोज की यह पेंटिंग एक ग्रामीण दृश्य को चित्रित करती है —
एक छोटी लड़की बकरी चराने निकली है। बकरी के गले में बंधी रस्सी को वह अपने हाथों से थामे हुए है। उसी क्षण सामने से एक दुल्हन की डोली गुजरती है। बच्ची ठिठककर डोली को देखती है और अपने मन में तुलना करती है — बकरी और दुल्हन दोनों ही किसी न किसी “बंधन” में बंधी हैं।

बकरी सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है, तो दुल्हन परंपरागत बंधन का। अशोक सरोज ने इस चित्र के माध्यम से यह गहरी अनुभूति दी है कि जीवन में स्वतंत्रता और जिम्मेदारी, दोनों का अपना अलग अर्थ है — परंतु हर बंधन में एक भावनात्मक करुणा छिपी होती है।


समापन टिप्पणी:

अशोक सरोज की कला हमें यह सिखाती है कि समाज में हर व्यक्ति किसी न किसी भूमिका में बंधा है, परंतु उस बंधन में भी सौंदर्य, समर्पण और संवेदना की झलक छिपी है। यही संवेदनशील दृष्टि उन्हें एक सच्चा कलाकार बनाती है।


दैनिक नव परिधि मीडिया सर्विसेज एंड पब्लिकेशन (पंजीकृत)

अमित श्रीवास्तव (प्रधान संपादक)


Wednesday, October 15, 2025

कला के कैनवास पर भारतीय विरह और संघर्ष की कथा

 रिपोर्ट: कला के कैनवास पर भारतीय विरह और संघर्ष की कथा



विषय: अशोक सरोज की कलाकृति 'प्रतीक्षा की नींद' का विश्लेषण एवं कलात्मक महत्व

तिथि: 16 अक्टूबर,  2025

प्रकाशक:दैनिक नव परिधि मीडिया सर्विसेज एंड पब्लिकेशन


1. कलाकार का परिचय: संघर्ष से सफलता तक की प्रेरणादायक यात्रा

· नाम: अशोक सरोज

· पद/उपलब्धियाँ: बॉलीवुड के वरिष्ठ कैमरामैन, अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडलिस्ट

· पृष्ठभूमि: उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के एक छोटे से गाँव 'चारो' के एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनका मुंबई तक का सफर कोई आसान नहीं, बल्कि अनेक संघर्षों, कठिनाइयों और दृढ़ निश्चय से भरा हुआ था। यह यात्रा ही उनकी कला में गहराई और वास्तविकता का आधार बनती है।

2. कलाकृति का विवरण: 'प्रतीक्षा की नींद'

· केंद्रीय भाव (थीम): प्रेम में विरह (बिछड़ने का दर्द) और प्रतीक्षा की वेदना।

· दृश्य: एक युवा राजकुमारी, जो अपने प्रेमी की याद में करते-करते नींद आ जाने के कारण सोई हुई है।

· पात्र: राजकुमारी और एक तोता, जो उसका प्रेमी का प्रतिनिधित्व करता है।

· वातावरण निर्माण: चित्र में एक खिड़की, एक गमला और एक दीवार पर टँगी पेंटिंग (जिसमें पहाड़, नदी और पेड़ दर्शाए गए हैं) शामिल हैं। ये सभी तत्व मिलकर एकाकीपन, प्रतीक्षा और प्रकृति के साथ एकात्मकता का भाव पैदा करते हैं। पहाड़ और नदी का दृश्य विरह की वेदना को और अधिक गहरा एवं दृश्यमान बनाता है।

3. प्रतीकवाद और अर्थ की गहराई

· सोई हुई राजकुमारी: प्रतीक्षा की लंबी और थकाऊ प्रक्रिया का प्रतीक है। नींद उसके दैनिक जीवन की निष्क्रियता और उदासी को दर्शाती है।

· तोता: एक दूत के रूप में कार्य करता है। वह प्रेमी की ओर से एक प्रेम पत्र लेकर आया है, जो आशा और संचार का प्रतीक है। राजकुमारी को जगाने का उसका प्रयास, बाहरी दुनिया से आए सुखद समाचार और मिलन की आशा का संकेत देता है।

· खिड़की: बंद होने और खुलने दोनों का भाव रखती है। यह उस बाहरी दुनिया की ओर संकेत करती है जहाँ से प्रेमी लौटेगा, साथ ही राजकुमारी के एकांत का भी प्रतीक है।

· पहाड़, नदी और पेड़ों वाली पेंटिंग: यह दृश्य प्रेमी और प्रेमिका के बीच की दूरी को दर्शाता है। पहाड़ बाधाओं का, नदी बहते समय और भावनाओं का, तथा पेड़ स्थिरता और धैर्य का प्रतीक हैं।

4. सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ

यह चित्र भारतीय साहित्य और लोककथाओं में विरह के शाश्वत विषय को आधुनिक कैनवास पर पुनर्जीवित करता है। यह उस सांस्कृतिक परंपरा को दर्शाता है जहाँ प्रेमी की प्रतीक्षा में नायिका का 'विरह-वेदना' में डूबा होना एक सामान्य भाव है। अशोक सरोज ने इस शास्त्रीय भाव को एक सार्वभौमिक और सरल रूप में प्रस्तुत किया है।

5. निष्कर्ष

अशोक सरोज की यह कृति न केवल एक सुंदर दृश्य चित्रण है, बल्कि भावनाओं का एक गहन अध्ययन भी है। यह कलाकार के अपने जीवन के संघर्षों से उपजी संवेदनशीलता को दर्शाती है। इस पेंटिंग के माध्यम से, दर्शक न केवल एक राजकुमारी की कहानी देखता है, बल्कि हर उस इंसान की भावना को महसूस करता है जो किसी अपने के इंतजार में है। यह कला का वह रूप है जो व्यक्तिगत संघर्ष और सार्वभौमिक भावनाओं के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण करती है।


रिपोर्ट तैयारकर्ता:

दैनिक नव परिधिमीडिया सर्विसेज एंड पब्लिकेशन 

(कलाएवं संस्कृति विश्लेषण टीम)

अमित श्रीवास्तव (प्रधान संपादक)