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Tuesday, September 2, 2025

भारत-चीन संबंध और SCO बैठक का विश्लेषण

न्यूज़ विश्लेषण रिपोर्ट (अमित श्रीवास्तव)

प्रतीकात्मक तस्वीर 


दैनिक नव परिधि:
विषय: भारत-चीन संबंध और SCO बैठक का विश्लेषण


1. प्रस्तावना

2025 में चीन के तियानजिन में आयोजित SCO (शंघाई सहयोग संगठन) की बैठक में भारत, चीन और रूस के बीच उभरते समीकरणों ने वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा की। अमेरिका के साथ बढ़ते मतभेद और चीन के साथ दोस्ती की संभावनाएँ भारत के लिए नई दिशा तय कर सकती हैं। सवाल यह है कि क्या यह साझेदारी स्थायी होगी या केवल अमेरिका पर दबाव बनाने की रणनीति?


2. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

  • चीन का प्राचीन दृष्टिकोण:

    • 1405 में चीनी व्यापारी झेंग-हे (झिंगे) ने भारत के कोचीन तट पर व्यापार की नींव रखी।
    • चीन का दृष्टिकोण हमेशा से व्यापार-केन्द्रित रहा, न कि उपनिवेशवादी।
    • इसके विपरीत यूरोपीय व्यापारी जैसे वास्कोडिगामा बाद में आये और उपनिवेशवाद का विस्तार किया।
  • मिंग, किंग और माओ का चीन:

    • मिंग वंश (1368-1644) से लेकर किंग वंश (1644-1912) तक चीन ने आंतरिक और बाहरी संकट झेले।
    • 1949 में माओत्से तुंग के नेतृत्व में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का गठन हुआ।

3. भारत-चीन सीमाई विवाद और कूटनीति

  • 1951-1962: तिब्बत, अक्साई चिन और नेफा क्षेत्रों को लेकर तनाव बढ़ा।
  • 1962 का युद्ध: यह सीमा विवाद तक ही सीमित रहा, किसी देश ने इसे पूर्ण युद्ध नहीं कहा।
  • दलाई लामा प्रकरण: दलाई लामा को भारत में शरण देने से चीन-भारत रिश्तों में कड़वाहट आई।

4. कूटनीतिक संबंधों की पुनर्स्थापना

  • राजीव गांधी युग (1988): भारत-चीन रिश्तों में सुधार की शुरुआत।
  • 2020 गलवान घाटी झड़प: संबंधों में तनाव की चरम स्थिति।
  • SCO बैठक 2025: मोदी, पुतिन और जिनपिंग की त्रिकोणीय मुलाक़ात से नई संभावनाएँ उभरीं।

5. आर्थिक और सांस्कृतिक पहलू

  • चीन और भारत दोनों आर्थिक विकासतकनीकी नवाचार पर केंद्रित रहे हैं।
  • ASEAN देशों में भारतीय संस्कृति और भाषा का गहरा असर है, तमिल यहाँ की अधिकृत भाषाओं में से एक है।

6. मौजूदा परिदृश्य और चुनौतियाँ

  • अमेरिका से बढ़ते मतभेद भारत को चीन के करीब ला सकते हैं।
  • सवाल है कि भारत-चीन साझेदारी रणनीतिक गठबंधन बनेगी या केवल राजनीतिक संतुलन का खेल होगी?
  • सीमा विवाद, दलाई लामा का मुद्दा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की महत्वाकांक्षा अभी भी अवरोधक हैं।

7. निष्कर्ष

भारत और चीन यदि अपने ऐतिहासिक मतभेदों को भुलाकर आर्थिक सहयोग, सीमा शांति और सांस्कृतिक साझेदारी पर ध्यान दें, तो यह साझेदारी एशिया के लिए स्थायी शांति और आर्थिक समृद्धि का मार्ग खोल सकती है। लेकिन अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता के बीच भारत की भूमिका रणनीतिक संतुलन की रहेगी या नई ध्रुवीय शक्ति की, यह भविष्य तय करेगा।


दैनिक नव परिधि मीडिया सर्विसेज एंड पब्लिकेशन 

अमित श्रीवास्तव (प्रधान संपादक)


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