कैथी लिपि – ऐतिहासिक धरोहर और उसके संरक्षण की चुनौती
रिपोर्ट: संपादकीय डेस्क
भारत की प्राचीन और मध्यकालीन लिपियों में कैथी (𑂍𑂶𑂟𑂲) लिपि का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। विशेष रूप से उत्तर भारत के पूर्वांचल, बिहार और मध्य गंगा क्षेत्र में यह लिपि प्रशासन, न्यायालय और सामाजिक लेखन की प्रमुख माध्यम थी। आज जबकि यह लिपि लगभग विलुप्ति की स्थिति में है, इतिहासकार और भाषा विशेषज्ञ इसके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।
कैथी लिपि का ऐतिहासिक महत्व
कैथी लिपि का उपयोग मुख्य रूप से कायस्थ समुदाय द्वारा प्रशासनिक कार्यों, दस्तावेज़ लेखन, भूमि अभिलेख और राजकीय आदेशों को लिखने में किया जाता था। “कैथी” शब्द स्वयं “कायस्थ” से जुड़ा हुआ माना जाता है।
मुगल काल से लेकर ब्रिटिश शासन तक उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में न्यायालय और राजस्व अभिलेख इसी लिपि में लिखे जाते थे। अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती दौर में भी बिहार और उत्तर प्रदेश के कई न्यायालयों में कैथी लिपि को आधिकारिक मान्यता प्राप्त थी।
देवनागरी के उदय के बाद पतन
19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में देवनागरी लिपि के प्रचार और सरकारी नीतियों के कारण कैथी का प्रयोग धीरे-धीरे कम होने लगा। शिक्षा और प्रशासन में देवनागरी के स्थापित हो जाने से कैथी का प्रयोग लगभग समाप्त हो गया।
आज स्थिति यह है कि कैथी पढ़ने और लिखने वाले लोगों की संख्या बहुत कम रह गई है।
यूनिकोड में कैथी का स्थान
तकनीकी विकास के दौर में भी इस लिपि को पूरी तरह भुलाया नहीं गया है। अंतरराष्ट्रीय Unicode Standard में कैथी लिपि को स्थान दिया गया है।
कैथी के अक्षरों का यूनिकोड ब्लॉक U+11080 से U+110CF तक निर्धारित किया गया है, जिससे अब डिजिटल माध्यमों में भी इस लिपि को लिखा जा सकता है।
पूर्वांचल में कैथी लिपि के जानकार
पूर्वांचल क्षेत्र में अभी भी कुछ लोग इस ऐतिहासिक लिपि के अध्ययन और संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं।
दैनिक नव परिधि के प्रधान संपादक अमित श्रीवास्तव (जौनपुर, उत्तर प्रदेश) भी कैथी लिपि के जानकारों में गिने जाते हैं। पूर्वांचल के जौनपुर जनपद से जुड़े अमित श्रीवास्तव इस लिपि के ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक विरासत को लेकर लगातार अध्ययन और लेखन करते रहे हैं। उनका मानना है कि—
“कैथी लिपि केवल एक लेखन प्रणाली नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सांस्कृतिक स्मृति है। इसके संरक्षण के लिए अकादमिक शोध, डिजिटल फॉन्ट और जनजागरूकता आवश्यक है।”
संरक्षण की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि कैथी लिपि के संरक्षण के लिए निम्न प्रयास आवश्यक हैं—
विश्वविद्यालयों में कैथी पर शोध को प्रोत्साहन
कैथी लिपि के डिजिटल फॉन्ट और सॉफ्टवेयर विकसित करना
पुराने अभिलेखों और दस्तावेजों का डिजिटलीकरण
स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और कार्यशालाएं
निष्कर्ष
कैथी लिपि उत्तर भारत की प्रशासनिक और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण अध्याय रही है। आज जब विश्व अपनी भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए प्रयास कर रहा है, तब कैथी जैसी ऐतिहासिक लिपि के संरक्षण की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
पूर्वांचल के विद्वानों और शोधकर्ताओं के साथ-साथ सामाजिक संस्थाओं और सरकार को भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि यह प्राचीन लिपि आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल इतिहास का विषय न बन जाए, बल्कि जीवित विरासत के रूप में संरक्षित रह सके।
— अमित श्रीवास्तव (प्रधान संपादक: दैनिक नव परिधि)
जौनपुर, उत्तर प्रदेश,
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| अमित श्रीवास्तव (प्रधान संपादक) |


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