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| AI निर्मित सांकेतिक तस्वीर |
📰 दैनिक नव परिधि – संपादकीय रिपोर्ट
शीर्षक:
“जंगलराज की वापसी या राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई?"
— बिहार के ताज़ा अपराधों ने फिर उठाए सुशासन पर सवाल
उपशीर्षक:
हत्या पर हत्या, जातीय तनाव और चुनावी सियासत — क्या बिहार फिर पुराने भय में लौट रहा है?
भूमिका:
बिहार की ज़मीन फिर से खून से लाल हो रही है।
लगातार हो रही हत्याएँ न सिर्फ कानून-व्यवस्था की पोल खोल रही हैं, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर रही हैं कि 35 वर्षों की सत्ता के बाद भी बिहार “भयमुक्त” क्यों नहीं बन सका?
हर हत्या के बाद एक ही शब्द गूंजता है — “जंगलराज”।
राजनीति बनाम अपराध — दो चेहरे, एक सवाल:
बिहार में आज जो कुछ हो रहा है, वह चुनावी नतीजों से कहीं गहरा है।
यह राज्य की उस मानसिकता का प्रतीक है जहाँ हर घटना को राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है।
29 अक्टूबर को सीवान में दरोगा अनिरुद्ध कुमार की हत्या,
30 अक्टूबर को मोकामा में दुलारचंद यादव का एनकाउंटर-शैली मर्डर,
और 31 अक्टूबर को आरा में प्रमोद महतो और उनके बेटे प्रियांशु की गोली मारकर हत्या —
इन तीन दिनों में चार जानें गईं, पर राजनीति ने इसे भी जाति और गठबंधन के तराजू पर तौल दिया।
35 वर्षों का शासन, पर सुरक्षा अधूरी:
लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार तक, बिहार की सत्ता पर दो ही चेहरों का आधिपत्य रहा है।
नीतीश “सुशासन बाबू” के नाम से जाने जाते हैं, पर विपक्ष का तर्क है कि अब “सुशासन” की जगह “जंगलराज 2.0” आ गया है।
लालू यादव के शासन को भी यही नाम मिला था।
अंतर सिर्फ इतना है कि पहले अपराधी सत्ता से बाहर थे,
अब अपराध सत्ता के भीतर तक पहुँच गए हैं।
आंकड़ों की ज़बानी:
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार —
| वर्ष | मुख्यमंत्री | कुल अपराध | हत्याएँ | अपहरण | बलात्कार |
|---|---|---|---|---|---|
| 1992 | लालू यादव | 1.31 लाख | 5743 | 2700+ | 1120 |
| 2004 | राबड़ी देवी | 1.15 लाख | 3800 | 2500+ | 1000+ |
| 2022 | नीतीश कुमार | 3.5 लाख | 3000 | 12000 | 900 |
साफ़ है कि अपराधों की संख्या बढ़ी है, लेकिन हत्याओं में कमी आई है।
फिर भी सवाल यह नहीं कि अपराध कितने हुए, बल्कि यह है कि अपराध का डर क्यों बरकरार है?
मोकामा — जंगलराज का नया प्रतीक:
मोकामा में दुलारचंद यादव की हत्या के बाद वहाँ का माहौल भय और राजनीति के बीच झूल रहा है।
वीडियो वायरल, FIR दर्ज, और आरोपों की बाढ़ —
पर जनता के मन में सवाल वही है कि क्या बिहार फिर उस दौर में लौट रहा है जहाँ अपराध ही पहचान था?
जंगलराज की असली परिभाषा:
जंगलराज सिर्फ अपराधों का आंकड़ा नहीं होता।
यह वह स्थिति है जब जनता न्यायपालिका, प्रशासन और शासन — तीनों पर भरोसा खो देती है।
जब हर घटना के बाद लोग यह कहें कि “ये तो बिहार है”,
तो समझिए, शासन की आत्मा कमजोर पड़ चुकी है।
संपादकीय निष्कर्ष:
बिहार के लिए “जंगलराज” अब एक राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि एक सामाजिक मानसिकता बन चुका है।
कभी यह भय से उपजा, अब यह असंवेदनशीलता से पोषित हो रहा है।
सरकारें बदलती रहीं, पर व्यवस्था की कमजोरी जस की तस है।
अगर नेतृत्व सचमुच सुशासन चाहता है, तो उसे अपराधियों से पहले राजनीतिक अपराधीकरण का अंत करना होगा।
✍️ संपादक की टिप्पणी:
“जंगलराज का अर्थ सिर्फ अपराध नहीं,
बल्कि उस मौन से है जो न्याय की जगह डर को स्वीकार कर लेता है।”
— अमित श्रीवास्तव, संपादक (दैनिक नव परिधि)
दैनिक नव परिधि मीडिया सर्विसेज एंड पब्लिकेशन (पंजीकृत)


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