खबरें

Tuesday, January 13, 2026

कैनवास पर जीवन का महाकाव्य: अशोक सरोज की तूलिका से उभरा संघर्ष, साधना और राष्ट्रबोध

कैनवास पर जीवन का महाकाव्य: अशोक सरोज की तूलिका से उभरा संघर्ष, साधना और राष्ट्रबोध



दै‍निक नव परिधि:

प्रतीकों की भाषा में रचा गया आत्मविश्वास, ज्ञान और देशप्रेम का अमर चित्र

चित्रकार:अशोक सरोज 


जौनपुर:

कभी-कभी कला केवल देखने की वस्तु नहीं रहती, वह अनुभूति बन जाती है। जौनपुर की माटी से निकले और मुंबई की कला-भूमि पर अपनी सशक्त पहचान बनाने वाले वरिष्ठ सिनेमैटोग्राफर एवं अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त चित्रकार अशोक सरोज की नवीनतम पेंटिंग ऐसी ही एक अनुभूति है। यह कृति तूलिका से अधिक चिंतन की लेखनी है, जो कैनवास पर जीवन का सम्पूर्ण दर्शन अंकित कर देती है।

मणिकर्णिका आर्ट गैलरी की 49वीं अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन कला प्रदर्शनी में प्रदर्शित यह पेंटिंग दर्शकों को मौन संवाद में बाँध लेती है। इसमें हाथी और कुत्तों का प्रतीक मानवीय जीवन के उस सत्य को उद्घाटित करता है, जहाँ नया पथ चुनने वाला व्यक्ति आलोचनाओं के शोर से घिर जाता है। किंतु जैसे निर्भीक हाथी अपनी गरिमा में आगे बढ़ता है, वैसे ही संकल्पवान मनुष्य भी तुच्छ व्यवधानों से विचलित हुए बिना अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है। यह दृश्य आत्मबल और धैर्य का दृश्य श्लोक बन जाता है।

कैनवास के दूसरे धरातल पर विद्या का दीप प्रज्वलित है। पुस्तक को नमन करता विद्यार्थी यह उद्घोष करता है कि ज्ञान ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। वहीं महात्मा बुद्ध की शांत, करुणामयी छवि मन को स्थिरता, विवेक और आत्मबोध की ओर ले जाती है। दूसरी ओर, घोड़े पर सवार राजा का दुर्गारोहण साहस, नेतृत्व और कर्तव्यबोध का रूपक बनकर उभरता है। इन सभी तत्वों का संतुलित संयोजन इस पेंटिंग को केवल दृश्य नहीं, बल्कि विचारों का समन्वित ग्रंथ बना देता है।

भारतीय तिरंगे की उपस्थिति इस कृति में प्राणवायु की भाँति है। यह तिरंगा केवल रंगों का संयोजन नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति कलाकार की श्रद्धा, जड़ों से जुड़ाव और सांस्कृतिक आत्मा का उद्घोष है। इसमें राष्ट्रप्रेम भावुक न होकर चेतन और आत्मसात किया हुआ प्रतीत होता है।

अशोक सरोज की यह उपलब्धि किसी एक क्षण की परिणति नहीं, बल्कि वर्षों की साधना का प्रतिफल है। मणिकर्णिका आर्ट गैलरी द्वारा प्राप्त गोल्ड मेडल और देश-विदेश में मिले सम्मान इस बात के साक्ष्य हैं कि उनकी कला समय की कसौटी पर खरी उतरती है। सिनेमा की दृश्य-भाषा और चित्रकला की प्रतीकात्मक गहराई—दोनों का अद्भुत संगम उनकी कृतियों को विशिष्ट बनाता है।

जौनपुर के किसान परिवार से उठकर अंतरराष्ट्रीय कला मंच तक पहुँची उनकी जीवन-यात्रा स्वयं इस पेंटिंग की आत्मा में धड़कती प्रतीत होती है। यह कृति दर्शक को केवल देखने का अवसर नहीं देती, बल्कि सोचने, ठहरने और स्वयं से संवाद करने की प्रेरणा देती है।

निष्कर्षतः अशोक सरोज की यह पेंटिंग एक चित्र नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है—जहाँ संघर्ष साधना में बदलता है, ज्ञान शक्ति बनता है और राष्ट्रप्रेम आत्मा की पहचान। यही कारण है कि यह कृति समकालीन भारतीय कला में एक साहित्यिक-कलात्मक घोषणा के रूप में स्थापित होती है।

दैनिक नव परिधि मीडिया सर्विसेज एंड पब्लिकेशन 

प्रधान संपादक-अमित श्रीवास्तव 


No comments:

Post a Comment