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| अशोक सरोज (चित्रकार एवं सीनियर कैमरामैन बालीवुड) |
✍️ संपादकीय
शीर्षक:
गाँव की गलियों से दुनिया के मंच तक: अशोक सरोज की कहानी
आज के दौर में जहाँ अवसर अक्सर बड़े शहरों और सम्पन्न परिवारों तक सीमित माने जाते हैं, वहीं जौनपुर के महराजगंज के छोटे से गाँव चारो से निकलकर अशोक कुमार सरोज ने साबित कर दिया कि मेहनत और लगन के सामने कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।
गरीब परिवार में जन्मे अशोक सरोज ने कम उम्र में ही मुंबई का रुख़ किया। वहाँ फ़िल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध के बीच उन्होंने बतौर सीनियर कैमरा मैन कठिन परिश्रम से अपनी पहचान बनाई। लेकिन उनकी असली पहचान कैमरे के पीछे नहीं, बल्कि रंगों और ब्रश के साथ उभरी।
शौक़ से शुरू हुई चित्रकला धीरे-धीरे उनके जीवन का जुनून बन गई। यही जुनून उन्हें मणिकर्णिका आर्ट गैलरी की 45वीं इंटरनेशनल ऑनलाइन आर्ट एक्ज़ीबिशन एंड कम्पटीशन (10–20 सितंबर 2025) तक ले गया, जहाँ उन्होंने अपनी कला प्रतिभा के दम पर गोल्ड अवार्ड जीतकर इतिहास रचा।
यह उपलब्धि केवल अशोक सरोज की व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो संघर्ष और अभावों में भी सपने देखने का साहस रखते हैं।
इस प्रतियोगिता में भारत और विदेश के कई दिग्गज कलाकारों ने भी गोल्ड अवार्ड हासिल किया — आकाश चाँद (कोलकाता), आर्ज्या चक्रवर्ती (दुर्गापुर), दामोदर रामास्वामी (आंध्र प्रदेश), जसप्रीत मोहन सिंह (पंजाब), राहुल सोनकर (उत्तराखंड), सोनिया खुरियान (अर्जेंटीना), डॉ. अनीबल ओलीबेरो (वेनेजुएला) सहित अनेक नाम। इन सबके बीच अशोक सरोज का चमकना बताता है कि उनकी कला विश्वस्तरीय मानकों पर खरी उतरी है।
✨ निष्कर्ष
अशोक सरोज की यात्रा हमें यह सिखाती है कि सपनों का आकार परिस्थितियों से नहीं, बल्कि मेहनत और विश्वास से तय होता है। गाँव की गलियों से निकलकर जब कोई कलाकार दुनिया के मंच पर अपनी पहचान दर्ज कराता है, तो वह केवल अपनी नहीं, पूरे समाज की आशाओं को नया आयाम देता है।
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| अमित श्रीवास्तव (प्रधान संपादक) |



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